धर्मवीर भारती के ‘गुनाहों का देवता’ में सुधा की उपन्यास के अंत में अपने प्रेमी चंदर के सामने प्रसव-पीड़ा के दौरान मृत्यु हो जाती है तो बैरिस्टर गोविंद दास के उपन्यास ‘अमावस्या का चांद’ में मनीषा की कैंसर हॉस्पिटल में अपने प्रेमी काउल के लापता होने के गम में और उसके लौटने का इंतजार करते-करते मृत्यु हो जाती है। दोनों उपन्यासों की वेदना भी काफी हद तक मिलती-जुलती है। क्या यह सादृश्य संयोगवश हो सकता है अथवा तत्कालीन भारतीय साहित्यकारों की सम विचारधारा इसके मूल में हैं? जिस तरह ‘गुनाहों का देवता’ सन 1954 में ज्ञानपीठ, दिल्ली से प्रकाशित होकर आज तक अपने 70 संस्करण पूरे कर चुका है, इसी तरह ‘अमावस्या का चांद’ ने सन 1964 में ओड़िशा बुक स्टोर, कटक प्रकाशित होकर अपने 33 संस्करण पूरे कर चुका है। आज भी दोनों उपन्यास अपनी-अपनी जगह पर लोकप्रियता की पराकाष्ठा पर है।