कभी प्यार नहीं हो सकता

kabhi pyar nahin ho sakta

मौलश्री कुलकर्णी

मौलश्री कुलकर्णी

कभी प्यार नहीं हो सकता

मौलश्री कुलकर्णी

और अधिकमौलश्री कुलकर्णी

    यह जो तप-तपकर

    मेरी देह पर चढ़ रहा है

    यह बुख़ार नहीं हो सकता

    मुझे यक़ीन है मुझे तुमसे

    कभी प्यार नहीं हो सकता

    जब भी दिख जाओ कहीं तुम

    एक बंद पड़े कमरे में सीलन लग जाती है

    अपने ही जिस्म से मुझे बदबू आती है

    तुम्हें महसूस करके

    जैसे मेरे भीतर किसी शौचालय में

    एक साथ फैल गए हों

    पेशाब और टट्टी—

    हज़ारों लोगों के

    एक काला-सा सन्नाटा पसर जाता है

    जहाँ जलने लगती हूँ

    मैं तेज़ाब की गंध से

    एक आधे भरे शराब के गिलास में

    तैरती, डूबती, एक मक्खी जैसा महसूस करती हूँ मैं

    और उस गिलास के शीशे

    अंदर धँसते जाते हैं

    मेरी पसलियों, मेरी आँखों, मेरे गुर्दों में,

    लेकिन जानते हो?

    ये गंध, ये सन्नाटे, ये ज़ख़्म,

    आज बस मेरे लिए हैं...

    तुम अधजली एक सिगरेट रख दो

    मेरे पैरों के पास,

    ओढ़ लूँ आज उसे मैं और दिखावा करूँ

    गहरी नींद का उसके धुएँ से लिपटकर,

    उड़ेल दो यह शराब मेरे तकिये पर

    और बहने दो इसका नशा आज

    मेरे सपनों में

    आओ...

    स्रोत :
    • रचनाकार : मौलश्री कुलकर्णी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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