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जीवन पर उद्धरण

जहाँ जीवन को स्वयं कविता

कहा गया हो, कविता में जीवन का उतरना अस्वाभाविक प्रतीति नहीं है। प्रस्तुत चयन में जीवन, जीवनानुभव, जीवन-संबंधी धारणाओं, जीवन की जय-पराजय आदि की अभिव्यक्ति देती कविताओं का संकलन किया गया है।

अधिकतर अज्ञानता के सुख-दुःख की आदत थी। ज्ञान के सुख-दुःख बहुतों को नहीं मालूम थे। जबकि ज्ञान असीम अटूट था। ज्ञान सुख की समझ देता था पर सुख नहीं देता था।

विनोद कुमार शुक्ल

नितांत अव्यावहारिक होना नितांत ईमानदारी और अक़्लमंदी का लक्षण है।

विजय देव नारायण साही

फ़ुरसत निकालना भी एक कला है। गधे हैं जो फ़ुरसत नहीं निकाल पाते। फ़ुरसत के बिना साहित्य चिंतन नहीं हो सकता, फ़ुरसत के बिना दिन में सपने नहीं देखे जा सकते। फ़ुरसत के बिना अच्छी-अच्छी, बारीक-बारीक, महान बातें नहीं सूझतीं।

गजानन माधव मुक्तिबोध

पुरुष का जीवन संघर्ष से आरंभ होता है और स्त्री का आत्मसमर्पण से।

महादेवी वर्मा

मेरा स्वभाव या सिद्धांत या प्रवृत्ति कुछ ऐसी है (मेरे ख़याल से जो शायद सही भी है) कि जो व्यक्ति साहित्यिक दुनिया से जितना दूर रहेगा, उसमें अच्छा साहित्यिक बनने की संभावना उतनी ही ज़्यादा बढ़ जाएगी। साहित्य के लिए साहित्य से निर्वासन आवश्यक है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

जो कमज़ोरी सब मनुष्यों में हो सकती है, वह कमज़ोरी नहीं—बल्कि मनुष्य की प्रकृति का गुण-धर्म है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

अपनी व्यक्तिगत सत्ता की अलग भावना से हटाकर; निज के योगक्षेम के संबंध से मुक्त करके, जगत् के वास्तविक दृश्यों और जीवन की वास्तविक दशाओं में जो हृदय समय-समय पर रमता रहता है, वही सच्चा कविहृदय है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

रूप, गुण, आयु और त्याग—ये चार साधन मनुष्य को सौभाग्यशाली बनाते हैं।

वात्स्यायन

रचना-प्रक्रिया के भीतर केवल भावना, कल्पना, बुद्धि और संवेदनात्मक उद्देश्य होते हैं; वरन वह जीवनानुभव होता है जो लेखक के अंतर्जगत का अंग है, वह व्यक्तित्व होता है जो लेखक का अंतर्व्यक्तित्व है, वह इतिहास होता है जो लेखक का अपना संवेदनात्मक इतिहास है और केवल यही नहीं होता।

गजानन माधव मुक्तिबोध

सिनेमा मेरे लिए कोई 'art form' नहीं है, ये मेरे लोगों की सेवा करने का एक ज़रिया मात्र है। मैं कोई समाजशास्त्री नहीं हूँ और इसलिए ऐसे भ्रम नहीं पालता कि मेरा सिनेमा लोगों को बदल सकता है। कोई एक फ़िल्ममेकर लोगों को नहीं बदल सकता है। लोग बहुत विशाल हैं और वे अपने आप को ख़ुद बदल रहे हैं। में चीज़ें नहीं बदल रहा हूँ, जो भी बड़े बदलाव हो रहे हैं, मैं सिर्फ़ उन्हें दस्तावेज़ कर रहा हूँ।

ऋत्विक घटक

जब नकारात्मक भावनाओं का दमन किया जाता है, तो सकारात्मक भावनाओं का भी दमन हो जाता है और प्रेम मर जाता है।

जॉन ग्रे

जितने दिन तक मनुष्य कर्मकांड और सांप्रदायिक ज्ञान से मुक्त नहीं होता, उतने दिन तक वह सर्वमानव के उपयुक्त नहीं होता।

आचार्य क्षितिमोहन सेन

आत्म-साक्षात्कार बहुत आसान है, स्वयं का चरित्र-साक्षात्कार अत्यंत कठिन है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

पाखंडी लोग कितनी आसानी से इस जगत् को धोखे में डाल देते हैं। सभ्यता के प्राथमिक विकास-काल से लेकर भोली-भाली मानव-जाति पर, जाने कितना छल-कपट किया जा चुका है।

स्वामी विवेकानन्द

किसी के बारे में सब कुछ जान लेना, उसे फिर से अजनबी बना देता है।

निर्मल वर्मा

हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन, ‘कम से कम’ वाली बात हमसे कहिए।

रघुवीर सहाय

हमारी आँखें सामने हैं, पीछे नहीं। सामने बढ़ते रहो और जिसे तुम अपना धर्म कहकर गौरव का अनुभव करते हो, उसे कार्यरूप में परिणत करो।

स्वामी विवेकानन्द

कलावान् गुणीजन भी जहाँ पर वास्तव में गुणी होते हैं; वहाँ पर वे तपस्वी होते हैं, वहाँ यथेच्छाचार नहीं चल सकता, वहाँ चित्त की साधना और संयम—है ही है।

रवींद्रनाथ टैगोर

नियम साधना का लोभ भी कष्ट की मात्रा का हिसाब लगाकर आनंद पाता है। अगर कड़े बिछौने पर सोने से शुरू किया जाए; तो आगे चलकर मिट्टी पर बिछौना बिछाकर, फिर सिर्फ़ एक कंबल बिछाकर, फिर कंबल को भी छोड़कर निखहरी ज़मीन पर सोने का लोभ क्रमशः बढ़ता ही रहता है।

रवींद्रनाथ टैगोर

जगत से मन अपनी चीज़ संग्रह कर रहा है, उसी मन से विश्व-मानव-मन फिर अपनी चीज़ चुनकर, अपने लिए गढ़े ले रहा है।

रवींद्रनाथ टैगोर

संग्रहणीय वस्तु हाथ आते ही उसका उपयोग जानना, उसका प्रकृत परिचय प्राप्त करना, और जीवन के साथ-ही-साथ जीवन का आश्रयस्थल बनाते जाना—यही है रीतिमय शिक्षा।

रवींद्रनाथ टैगोर

अहं का स्वभाव होता है अपनी ओर खींचना, और आत्मा का स्वभाव होता है बाहर की तरफ़ देना—इसलिए दोनों के जुड़ जाने से एक भयंकर जटिलता की सृष्टि हो जाती है।

रवींद्रनाथ टैगोर

जहाँ कोई क़ानून नहीं होता, वहाँ अंतःकरण होता है।

पब्लिलियस साइरस

अभाव पर विजय पाना ही जीवन की सफलता है। उसे स्वीकार करके उसकी ग़ुलामी करना ही कायरपन है।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

सभ्यता इस तरह होनी चाहिए कि आदमी को अपने जीवन का अर्थ खोजने के लिए आज़ादी मिले।

श्याम मनोहर

यदि मनुष्य का जन्म लेकर मैं मानवीय अस्तित्व के उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकूँ, यदि मैं उसकी नियति को चरितार्थ नहीं कर सकूँ, तो उसकी सार्थकता ही क्या है?

सुभाष चंद्र बोस

जो लोग तमस से भरे हुए हैं, अज्ञानी और सुस्त हैं, जिनका मन कभी किसी विचार पर स्थिर नहीं होता, जो केवल मनोरंजन की लालसा रखते हैं—उनके लिए धर्म और दर्शन मात्र मनोरंजन की वस्तुएँ हैं। ये लोग दृढ़ निश्चयी नहीं होते। वे कोई बात सुनते हैं, उसे बहुत अच्छा समझते हैं, फिर घर जाकर सब कुछ भूल जाते हैं। सफल होने के लिए आपको अदम्य दृढ़ता और दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।

स्वामी विवेकानन्द

अन्य शास्त्रों के ज्ञान से रहित; किंतु चतुष्षष्टि कला से अलंकृत कामकला का ज्ञाता पुरुष, नर-नारियों की कला-विषयक गोष्ठी में अग्रगण्य होकर सम्मानित होता है।

वात्स्यायन

जो व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन के स्थान पर कृत्रिम, यांत्रिक जीवन का वरण करके तृप्त नहीं होता, उसके भीतर प्रश्न उठते ही रहते हैं और वह अनुत्तरित प्रश्नों के अरण्य में भटकता हुआ कहीं भी शान्ति नहीं पाता है।

रामधारी सिंह दिनकर

जो किसी चीज़ की इच्छा रखता हो और प्रकृति के साथ विलीन हो, उसके लिए प्रकृति के अनेक परिवर्तन, सौंदर्य और उदात्तता का एक अनुपम दृश्य प्रस्तुत करते हैं।

स्वामी विवेकानन्द

पंडिताई भी एक बोझ है; जितनी ही भारी होती है, उतनी ही तेजी से डुबाती है। जब वह एक जीवन का अंग बन जाती है, तब वह सहज हो जाती है, तब वह बोझ नहीं रहती।

हजारीप्रसाद द्विवेदी

बीती हुई घड़ियाँ ज्योतिषी भी नहीं देखता।

सरदार वल्लभ भाई पटेल

किसी भी व्यक्ति पर एकात्म श्रद्धा ग़लत है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

जहाँ सीधे प्रमाण नहीं मिलते, वहाँ दर्शन हावी हो जाता है।

भगत सिंह

नारी केवल माता है, और इसके उपरांत वह जो कुछ है, वह सब मातृत्व का उपक्रम मात्र। मातृत्व संसार की सबसे बड़ी साधना, सबसे बड़ी तपस्या, सबसे बड़ा त्याग और सबसे महान विजय है। एक शब्द में उसे लय कहूँगा—जीवन के व्यक्तित्व का और नारीत्व का भी।

प्रेमचंद

अपने जीवन से मनुष्य को सबसे बड़ी शिक्षा यह लेनी चाहिए कि संसार में दुःख है, किंतु उसे सुख में बदलना उसके हाथ में है।

रवींद्रनाथ टैगोर

परित्राण का अर्थ यह है कि व्यर्थता और असफलता से अपनी रक्षा करना, अपने भीतर सत्यरूपी जो रत्न छिपा हुआ है, उसका उद्धार करना।

रवींद्रनाथ टैगोर

असंयम को अमंगल जानकर छोड़ने में जिनके मन में विद्रोह जागता है, उनसे वह कहना चाहता है कि उसे असुंदर जानकर अपनी इच्छा से छोड़ दो।

रवींद्रनाथ टैगोर

तो हमारे अंतःकरण से अधिक भयंकर कोई साक्षी हो सकता है और कोई दोषारोपण करने वाला इतना शक्तिशाली।

सोफोक्लीज़

हममें से हर एक को भंगी बनकर सेवा करनी चाहिए। जो मनुष्य पहले भंगी नहीं बनता, वह ज़िंदा रह नहीं सकता है और रहने का उसे हक़ है।

महात्मा गांधी

लोग, लोभ, काम, क्रोध, अज्ञान, हर्ष अथवा बालोचित चपलता के कारण धर्म के विरुद्ध कार्य करते तथा श्रेष्ठ पुरुषों का अपमान कर बैठते हैं।

वेदव्यास

व्यक्ति का विकास बाह्य-समाज में तो होता ही है, वह परिवार में भी होता है। परिवार व्यक्ति के अंतःकरण के संस्कार में तथा प्रवृत्ति-विकास में पर्याप्त योग देता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

बड़ाई, पंडिताई, विवेकता और कुलीनता—ये सब मनुष्य के देह में तभी तक रहती हैं, जबतक शरीर में कामागिन नहीं प्रज्वलित होती। जब तक आदमी कामपीड़ित नहीं होता, तभी तक उसे अपने गौरव, विद्वत्ता, उच्च कुल की उत्पत्ति और सदाचार का ज्ञान रहता है।

भर्तृहरि

कला मानवीय जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है।

वासुदेवशरण अग्रवाल

असंगति जब हमारे मन के ऊपरी स्वर पर आघात करती है; तब हमको कौतुक जान पड़ता है, गहरे स्तर पर आघात करती है तो हमको दुःख होता है।

रवींद्रनाथ टैगोर

अदब और क़ायदे आदमी को बहुत जल्दी कायर बना देते हैं। ऐसा आदमी झगड़ा नहीं करता।

विनोद कुमार शुक्ल

मैं अब से पढ़ते हुए पुरुषों और बुनाई करती हुई स्त्रियों की तस्वीरें नहीं बनाऊँगा। मैं उन जीवित साथियों की तस्वीरें बनाऊँगा जो ज़िंदगी को जीना जानते हैं और उसे महसूस करते हैं, जो तकलीफ़ें सहते हैं और प्रेम करते हैं।

एडवर्ड मुंक

आवश्यकताओं की निर्विरोध और निर्बंध पूर्ति ही मनुष्य जीवन की स्वतंत्रता है।

विजयदान देथा

हमारी यथार्थ अर्थवत्ता हमारे अपने बीच में नहीं है, वह समस्त जगत के मध्य फैली हुई है।

रवींद्रनाथ टैगोर

कविता तो जीवन का प्रमाण मात्र है। अगर आपका जीवनदीप अच्छी तरह से जल रहा है, तो कविता सिर्फ़ राख है।

लियोनार्ड कोहेन