रविवार की एक शाम

rawiwar ki ek sham

अमेय कांत

अमेय कांत

रविवार की एक शाम

अमेय कांत

और अधिकअमेय कांत

    छत के कोने में

    महीनों से इकट्ठा कबाड़

    फैल कर आता हुआ भीतर तक

    पेड़ के पीछे से झाँकते हुए

    धीरे-धीरे ऊपर उठता

    मद्धिम लाल से पीला

    और फिर सफ़ेद होता पूरा चाँद

    हमारे शब्दों के बीच फैला

    उसका अधूरापन

    सर के बिल्कुल ऊपर से उड़ कर जाते

    घर लौटते कुछ पक्षी

    बाहर खेलते बच्चों को

    आवाज़ देकर बुलाती माँएँ

    सामने के पेड़ की टहनियों में उलझी दो पतंगें

    आस-पास की छतों पर

    दिन भर से सूख रहे अलसाते कपड़े

    इस शहर के धुंधलके को

    अगले शहर में गहरा रहे अँधेरे से जोड़ती

    ट्रेन की आवाज़

    छुट्टी के दिन के अंत में

    पूर्णविराम की तरह

    कुछ-कुछ अपरिहार्य-सा

    एक बोझिल अवसाद

    स्रोत :
    • पुस्तक : समुद्र से लौटेंगे रेत के घर (पृष्ठ 42)
    • रचनाकार : अमेय कांत
    • प्रकाशन : अंतिका प्रकाशन
    • संस्करण : 2016

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