सरयू में काँप रही थी अयोध्या की परछाईं

saryu mein kanp rahi thi ayodhya ki parchhain

अरुण देव

अरुण देव

सरयू में काँप रही थी अयोध्या की परछाईं

अरुण देव

और अधिकअरुण देव

    अयोध्या के पास फ़ैज़ से आबाद इस नगर की एक गली में

    तब रहती थीं कुछ ख़ुदमुख़्तार औरतें

    अदब और तहज़ीब की किसी पुरानी दरी पर बैठीं

    स्त्री-पुरुष के आकर्षण के फीके उत्सव में मटमैली होती हुईं

    रोज़-ब-रोज़

    उस गली पर और उन जैसी तमाम गलियों पर

    जो हर नगर में सितारों की तरह सजती थीं

    और चमकती थीं ख़्वाबों में कभी

    बीसवीं शताब्दी का कुहासा कुछ इस तरह उतरा

    कि टूट कर बिखर गए उमराव जान के घुँघरू

    बुझ चले कजरी, ठुमरी दादरा के रौशन चराग़

    जहाँ से अब रह-रह आती

    बेगम अख़्तर की उदास कर देने वाली आवाज़

    यह वह समय था जब

    दिग्विजय के लिए निकले रथ के उड़ते धूल से

    ढक गए थे राम

    दसों दिशाओं से रह-रह उठता विषम हूह

    और बाज़ार के लिए सब कुछ हो गया था कारोबार

    बाज़ार के रास्ते में रही थी यह गली

    दुपहर की चिलचिलाती धूप में

    उस दिन कुछ लोग खड़े हुए

    सरयू में काँप रही थी अयोध्या की परछाईं

    हिल रही थीं सारी पुरानी इमारतें

    बेनूर खिड़कियों पर लटके उदास परदों के पीछे

    सिर जोड़े खड़ी थीं स्त्रियाँ

    असहाय

    ये स्त्रियाँ अपनी-अपनी मिथिला में

    कभी देखती थीं अपने राम के सपने

    किसी विद्यापति ने इनके लिए भी लिखी थीं पदावलियाँ

    जिसे जब-तब ये आज भी गुनगुनाने बैठ जाती हैं

    देखेते-देखेते निकल आए बनैले सींग

    छुपे दाँत और पुराने नाख़ून

    उन पर गिरने लगे अपशब्द के पत्थर

    हालाँकि उनका होना ही अब एक गाली थी

    गुम चोट के तो कितने निशान थे वहाँ

    जयघोष में कौन सुनता यह आर्तनाद

    शोर में यह चीख़

    यह अलग तरह की क्रूरता थी

    देह से तो वे कब की बेदख़ल थीं

    उन्हें तो दिशाएँ तक पहचानती थीं

    रात के परिश्रम से श्रीहीन श्लथ देह की झुकी आत्माएँ

    रह-रह देखतीं अयोध्या की ओर

    वे तमतमाए चेहरे

    रात की पीली रौशनी में कितनी चाह से देखते थे इन्हें

    इन्हीं स्त्रियों ने जाने कितनी बार

    मुक्त किया था उन्हें उनकी ही अंधी वासना से

    अब यह स्त्री-पुरुष का आदिम खेल रहा

    कि स्त्री अपने आकर्षण से संतुलित कर ले पुरुष की शक्ति

    बग़ल में बह रही सरयू ने देखा

    सदियों बाद फिर एक वनवास

    इनके जनक थे

    बदक़िस्मती से रावण भी थे सबके

    पर इनके लिए कोई युद्ध नहीं लड़ा गया

    राज-नीति के बाहर अगर कहीं होते राम तो वे क्या करते

    स्रोत :
    • रचनाकार : अरुण देव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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