रविवासरीय 4.0 : दस सवालों के जवाब
अविनाश मिश्र
24 मई 2026
• इस तारीख़ पर अभी सवेरा नहीं उतरा है। पक्षियों के स्वर अभी दूर हैं। कुछ देर में दूर बीतेगा और वे चहचहाएँगे—अपने-अपने साथियों के साथ। इस प्रकार समूह में समूह के साथ न रहकर भी समूह के साथ होने की सचाई सँभली हुई है। उनके जीवन में तस्वीरें नहीं हैं, स्मृति है। उनके जीवन में सफ़रनामे नहीं हैं, सफ़र है। उनके जीवन में... उनके पास सबसे ताज़ा आवाज़ें हैं। मुझे समुद्र याद आता है—उसके एक निर्जन तट की प्रातःकालीन नीरवता—लहरें... लहरें... लहरें...
मुझे लहरें देखकर बुद्ध ध्यान आते हैं। बुद्ध ने बाहर की प्रकृति का बहुत अध्ययन किया, पर मुक्ति उन्हें अंतर की प्रकृति के अध्ययन से ही मिली। उन्होंने बहिर्तप को समझकर, अंतर्तप को महत्त्व दिया। उन्होंने जाति, जरा, रोग, मरण से अभिभूत हो; अजात, अरुग्ण, अजीर्ण, अमृत का अन्वेषण किया। अनित्य, नश्वर और भंगुर के बोध ने उन्हें समता में स्थित किया। वह सुंदर तरंगों से समरस हुए और उन्होंने अनुभव किया कि बाहर से भीतर तक और भीतर से बाहर तक सब कुछ तरंग ही तरंग है—प्रतिक्षण उत्पन्न होता हुआ, प्रतिक्षण नष्ट होता हुआ, प्रतिक्षण उत्पन्न होता हुआ—उत्पाद-व्यय... उत्पाद-व्यय... उत्पाद-व्यय... प्रत्येक परमाणु की यही गति है—समुदय-क्षय... बाहर के अध्ययन से बुद्ध की काया के अंतर में जो होने लगा; उसके विभाजन, विघटन और विश्लेषण ने उन्हें भव-भ्रम, भव-भ्रमण और भव से विमुक्त किया। उन्होंने निसर्ग के नियम से संबद्ध कर्म-संस्कारों और देह और चित्त के प्रपंच को देखा। इस प्रपंच से उत्पन्न सुखद वेदनाएँ राग उत्पन्न करती हैं और दुखद वेदनाएँ द्वेष उत्पन्न करती हैं। उन्होंने इन वेदनाओं को राग-द्वेष से मुक्त होने के लिए माध्यम जाना। वह चित्त की चेतना को निर्मल करने के लिए, चित्त को एकाग्र करने की ओर गए। एक सौ इक्कीस प्रकार के चित्त होते हैं और बावन प्रकार की चित्त-वृत्तियाँ। उन्होंने पाया कि चित्त वर्तमान में नहीं रहता; वह अत्यंत चपल है, वह भागता है—भूतकाल की ओर या भविष्य की ओर।
वर्तमान : एक छोटी ओखली में एक छोटे मूसल से अदरक के कुटने की आवाज़ आ रही है। सुबह की चाय बन रही है कहीं... मैं कुछ प्रश्नों के उत्तर देने बैठ गया हूँ। ये प्रश्न हमारी पीढ़ी के आलोचक संतोष अर्श के हैं। यह संवाद मेरी कुछ कविताओं के साथ ‘कृति बहुमत’ में प्रकाशित होना है। मैं उत्तर दे चुका हूँ। अब आगे का सब कुछ ‘कृति बहुमत’ [मई 2026, संपादक : विनोद मिश्र] से साभार है...
• बचपन कैसा रहा?
मैं 1986 की जनवरी में ग़ाज़ियाबाद में पैदा हुआ। मेरा बचपन मुझसे तीन साल बड़े एक भाई, मुझसे पाँच साल बड़ी एक बहन, मुझसे नौ साल बड़ी एक और बहन और अपने माता-पिता के साथ सामान्य रूप से गुज़र सकता था; अगर 1989 के अक्टूबर में दीपावली के आस-पास मस्तिष्काघात से मेरे पिता का देहांत न हो गया होता।
इस दुर्घटना के बाद जब स्मृतियाँ आकार लेना शुरू करती हैं, मैं पाता हूँ कि मुझे ग़ाज़ियाबाद से सपरिवार लाकर कानपुर की एक सबसे बदनाम बस्ती क़ुली बाज़ार में छोड़ दिया गया है। यह इलाक़ा ‘खटिकाना’ कहलाता था/है—यानी खटिकों का मुहल्ला। कानपुर के खटिकों का मुख्य पेशा सुअर-पालन, सब्ज़ी-व्यापार-आढ़त और अमानवीय सूद पर क़र्ज़ देना है। मेरे बचपन के दिनों में वे मुहल्ले के ही नहीं, सारे शहर के सबसे दबंग लोग थे और ब्राह्मणों और बनियों के कई घर पुराने कानपुर में उनके दिए क़र्ज़ में डूबे हुए थे।
कुली बाज़ार में ब्राह्मणों के घर गिने-चुने थे। ये घर ख़ुद के नहीं थे, पर ट्रस्ट के होने की वजह से इनका किराया बहुत मामूली था और इसलिए इनमें रह रहे लोग तमाम तकलीफ़ों के बावजूद इन्हें छोड़कर नहीं जाते थे। वे मैले-कीचड़, धूल-धक्कड़, बहुत सँकरी-गंदी गलियों-गालियों और अवैध झुग्गियों-मड़ैयों के बीच नगर के केंद्र में बने-बसे-बचे रहते थे। मैं भी यहीं बड़ा हुआ—बग़ैर साहित्य-संस्कृति का संस्कार लिए हुए।
उन दिनों मेरा पढ़ाई में बिल्कुल भी मन नहीं लगता था। मैं जल्द से जल्द ज़्यादा से ज़्यादा धन कमाकर कानपुर न सही, पर क़ुली बाज़ार से बाहर निकलना चाहता था। मैं महज़ नौ-दस साल का ही हुआ था और ये विचार मेरे दिमाग़ में सोनू निगम, उदित नारायण, कुमार शानू, अनुराधा पौडवाल, कविता कृष्णमूर्ति, एस.पी. बालासुब्रमण्यम, हरिहरन, जगजीत सिंह, पंकज उधास, अताउल्लाह ख़ाँ, बाबा सहगल, दलेर मेहंदी, अल्ताफ़ राजा, अनु मलिक, अलीशा चिनॉय, शाज़िया मंज़ूर, नुसरत फ़तेह अली ख़ान, जुनून [बैंड] के गाए-बनाए गानों के साथ गूँजने लगे थे। इस दृश्य में सुधीर मिश्र निर्देशित फ़िल्म ‘धारावी’ दूरदर्शन पर अक्सर चलती रहती थी। ‘धारावी’ मुझे तब बिल्कुल समझ में नहीं आती थी; लेकिन मैं इसके नायक [ओम पुरी] की तरह हो चुका था, जिसके सपनों में माधुरी दीक्षित यथार्थ थी और यथार्थ में ‘धारावी’ से निकलने का स्वप्न था।
वह साल 2003 की जुलाई थी, जब मैंने अपनी बड़ी बहन और बड़े भाई के साथ क़ुली बाज़ार हमेशा के लिए छोड़ दिया और कुछ महीनों बाद कानपुर भी। एक बड़ी बहन का विवाह हो चुका था। पिता हमें और इस दुनिया को बहुत पहले ही छोड़कर जा चुके थे और माँ भी 1999 के नवंबर में दीपावली के आस-पास ही पिता की गति को प्राप्त हो चुकी थीं। इस स्थिति के बहुत विश्लेषण में जाने से बहुत विवरण बढ़ेंगे और बहुत भावुकता भी। यहाँ ज़्यादा गहराई ज़्यादा सहानुभूति पैदा कर सकती है और आत्मदया भी। ये चीज़ें संवाद में व्यक्ति को लचर बना देती हैं। वह प्रसन्न दिवसों में भी बिलखता हुआ नज़र आता है। निर्धनता सदा ढकने और हटा-मिटा देने की चीज़ है। उसे भूलिए मत, लेकिन ध्यान खींचने के लिए बेवजह याद भी मत कीजिए।
• ज़माने से क्या मिला?
दुःख। साथ। सुख। अभाव। सहयोग। अन्याय। क्रूरता। स्वर। व्याकुलता। मौन। तालीम। भटकन। सफ़र। धोखा। समझ। घृणा। प्रेम। दर्द। कविता...
• कविता जीवन में आई थी या जीवन से कविता में गए थे?
कविता ही जीवन में आती है, अगर आप कवि हुए हैं तो... बहुत जीवनानुभव हैं तो कोई कवि हो सकेगा, यों नहीं है।
क़ुली बाज़ार छोड़ने और दिल्ली आने के बीच के समय में मैं कविता रचने लगा; लेकिन धर्मसंबद्ध ग्रंथों को छोड़ दें तो कविता की किताब कैसी होती है, मैं नहीं जानता था। इस अवधि में मुझसे क़रीब दो सौ कविताएँ हुईं—पूर्णतः छंदबद्ध-तुकांत। इनमें अपने बचपन, बचपन के साथियों, प्रेम और संबंधों... सबके सदा के लिए छूट जाने की लयमय गाथा थी। मेरा तब तक साहित्य और कविता के संसार से सिर्फ़ उतना ही परिचय था, जितना एक बारहवीं उत्तीर्ण विद्यार्थी का पाठ्यक्रम में शामिल रही आई रचनाओं से होता है। बहरहाल, उन दो सौ कथित कविताओं वाले तीन रजिस्टर मैंने पाँच महीने में भरे, लेकिन उन्हें उनकी सही जगह यानी आग और डस्टबिन तक पहुँचाने में मैंने पाँच साल लगा दिए। इन पाँच सालों में मेरा परिचय देश-दुनिया की महान् कविताओं से हुआ। यह वर्ष 2004-2009 के बीच का वक़्त है। यह दौर ही मेरा अज्ञातवास था/है, जो आगे भी कुछ वर्षों तक जारी रहा।
• जीवन की दरारें किससे भरेंगी? स्मृति से, कल्पना से या मौन से?
मुझे लगता है कि तीनों से ही। जीवन-स्थितियाँ तय करेंगी कि जीवन की दरारें किससे भरेंगी—स्मृति से, कल्पना से, मौन से... या मौत से!
• संघर्ष ने दुनिया को करुणा से देखने की दृष्टि दी या अधिक कठोर बना दिया?
“मैं ग़लत वक़्त पर भावुक इसलिए हो उठता हूँ, क्योंकि सही वक़्त पर कठोर बने रहना चाहता हूँ।” यह उद्धरण मुझे अपना उद्धरण लगता है, लेकिन यह जितेंद्र कुमार की एक कहानी ‘मेरे शहर में घोड़े’ से है, और मुझे यह स्वीकार करने में क़तई झिझक नहीं है कि तमाम दैनिक प्रसंगों में मुझे जितेंद्र कुमार का कवि-कथाकार अक्सर याद आता है।
• लहजे में व्यंग्य कहाँ से आता है—कुंठा से, क्रोध से, दुःख से, ऊब से या किसी गहरी समझ से?
आपके साथ एक सुंदर समस्या और मेरे साथ इस स्थिति में एक सहज सुविधा यह है कि आपके मुझसे किए गए कुछ प्रश्न अपने उत्तर साथ लिए हुए चल रहे हैं।
• ‘शेखर’ को नया [उपजीव्य] क्यों करना पड़ा?
मैं समझना-जानना-देखना चाहता था कि शेखर आज होता तो कैसा होता, कैसे रहता-जीता-मरता...
• अंतिम चुनाव क्या होगा? व्यक्ति या समूह, अस्तित्व या अस्मिता, कल्पना या यथार्थ, कला या विचार?
व्यक्ति, अस्तित्व, यथार्थ, विचार... अगर चुनने का विकल्प हो तो मेरा अंतिम चुनाव तो यही होगा।
• गद्य से—सत्य की ओर जाने का मार्ग बदल जाता है क्या?
नहीं! मेरे लिए तो नहीं।
• अपने समय का क्या और किसे पढ़ना पसंद है?
मैं अपने समय का वह सब कुछ देखना चाहता हूँ, जो मेरे सामने से गुज़रता है या सामने आ जाता है। मैं बहुत कुछ तक बहुत यत्न-संघर्ष करके भी जाना चाहता हूँ। मैं बहुत कुछ को अगर समग्रता में देख-पढ़-समझ न पाऊँ, तब भी उसे कुछ देर तक देखता-उलटता-पलटता-पढ़ता-जाँचता ज़रूर हूँ। मेरे सामने का सब कुछ मेरी ज़िम्मेदारी है। हिंदी में साहित्य की सभी विधाएँ मुझे पसंद हैं; उन्हें पढ़ना भी और उनमें काम करना भी, लेकिन आलोचना और समीक्षा ने इस दौर में इस क़दर पतनशीलता को स्पर्श किया है कि मुझे अब इन दोनों से ही वितृष्णा होती है। दरअस्ल, मुझे रचाव वाला गद्य चाहिए; भले ही वह रचना न होकर, रचना पर हो। स्थितियाँ चाहे जैसी हों—ख़राब गद्य अक्षम्य है, अगर उसे पढ़ने के उद्देश्य से परोसा जा रहा है।
ख़ैर, मुझे अब हिंदी में ऐसा कोई वरिष्ठ नज़र नहीं आता जिसके नए काम का मुझे इंतिज़ार हो। उनके पुराने काम और पन से मैं बहुत अच्छी तरह वाक़िफ़ हूँ।
मुझसे ठीक या कुछ पहले के, मेरे साथ के और मेरे बाद हुए बहुत सारे हिंदी लेखक ऐसे हैं जिनका लिखा एक समय मुझे बहुत आकर्षित करता था और जिनके नए काम का मैं बराबर इंतिज़ार करता था, लेकिन अब मैं उन्हें पूरी तरह पढ़ नहीं पाता हूँ। इसकी वजहें साहित्यिक भी हैं और साहित्येतर भी। इसके बावजूद इस सिलसिले में अब भी बहुत सारे ऐसे रचनाकार हैं, जिनका नया कुछ भी सामने आने पर मैं ज़रूर पढ़ता हूँ, जैसे :
अंचित, अखिलेश सिंह, अच्युतानंद मिश्र, अजय नेगी, अतुल तिवारी, अदिति शर्मा, अनस ख़ान, अनुज लुगुन, अभिजीत, अमर दलपुरा, अमित तिवारी, अमितेश कुमार, आमिर हमज़ा, आयशा आरफ़ीन, आयुष्मान, अजय दुर्ज्ञेय, आसित आदित्य, उज्ज्वल शुक्ल, उदय शंकर, उपांशु, उस्मान ख़ान, ऋत्विक्, ऐश्वर्य राज, ओसामा ज़ाकिर, कमल जीत चौधरी, कविता कादंबरी, कुणाल सिंह, कुमार अनुपम, कुशाग्र अद्वैत, गार्गी मिश्र, गौरव सोलंकी, चंदन पांडेय, ज़ुबैर सैफ़ी, जोशना बैनर्जी आडवानी, ज्योति शोभा, तनुज, तसनीफ़ हैदर, धर्मेश, नईम सरमद, निशांत कौशिक, नीरज, नेहा नरूका, पंकज प्रखर, पराग पावन, पार्वती तिर्की, प्रकृति करगेती, प्रज्वल चतुर्वेदी, प्रतीक ओझा, प्रदीप अवस्थी, प्रदीप सैनी, प्रदीप्त प्रीत, प्रभात, प्राची, बकुल देव, बलराम कांवट, बाबुषा कोहली, बेबी शॉ, मनीष कुमार यादव, मनोज कुमार झा, मनोज कुमार पांडेय, मयंक जैन परिच्छा, महेश वर्मा, मोनिका कुमार, यशस्वी पाठक, रचित, रमाशंकर सिंह, रवि प्रकाश, रश्मि भारद्वाज, राकेश कुमार मिश्र, राजेश कमल, राही डूमरचीर, लवली गोस्वामी, वसु गंधर्व, विजयश्री तनवीर, विजया सिंह, विमल चंद्र पांडेय, विवेक भारद्वाज, वीरू सोनकर, व्योमेश शुक्ल, शचींद्र आर्य, शशांक मिश्र, शशिभूषण, शायक आलोक, शिवम तोमर, शिवेंद्र, शुभम नेगी, शुभम श्री, शैलेंद्र कुमार शुक्ल, शैलेंद्र साहू, संदीप तिवारी, संदीप रावत, सत्य व्यास, सत्यम तिवारी, सत्यव्रत रजक, सपना भट्ट, सिद्धांत मोहन, सुधांशु फ़िरदौस, सुमित त्रिपाठी, सोमप्रभ, सोमेश शुक्ल, सौम्य मालवीय...
बाक़ी मैं आपको और आप तो मुझे अक्सर पढ़ते ही रहते हैं ☺️
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~ इस संवाद के साथ ‘कृति बहुमत’ में प्रकाशित कविता/कविताएँ यहाँ पढ़ सकते हैं : अगर कहीं मैं तोता होता [रघुवीर सहाय के लिए नहीं]
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