फ़िक्शन एक ज़्यादा बड़ा सच है : ख़ालिद जावेद से पूजा भाटिया की बातचीत
हिन्दवी डेस्क
08 जून 2026
तक़रीबन पाँच साल पहले मैंने पहली बार ख़ालिद जावेद का उपन्यास ‘मौत की किताब’ पढ़ा था। पाँच बरस बाद जब उसे दुबारा पढ़ा तो साथ में उनका उपन्यास ‘नेमतख़ाना’ और ‘आख़िरी दावत और अन्य कहानियाँ’ भी पढ़ीं। इस दौरान उनके कहन ने ज़ेहन के उन बेतरतीब और दुश्वार रास्तों में मेरा हाथ थामे रखा, जहाँ ख़यालों के उलझे हुए जाले हैं, बेतहाशा फैली तीरगी है और ऐसे धूसर मंज़र हैं जिनसे हम अक्सर आँख चुराकर गुज़र जाना चाहते हैं।
गए दिनों दिल्ली-प्रवास के दौरान मैंने उनसे मुलाक़ात की ख़्वाहिश ज़ाहिर की, जिसे उन्होंने बेहद मोहब्बत से क़ुबूल किया। दोस्त तसनीफ़ हैदर के साथ उनसे मुलाक़ात हुई। वह भरपूर आत्मीयता के साथ मिले। उनसे देर तक बातें होती रहीं। दुनिया-जहान का अदब, किताबें, मुसन्निफ़ और उनके अनुभव उस वक़्त ख़ालिद साहब की बातों के ज़रिये हमारे दरमियान मौजूद थे। साथ ही, मेरे भीतर बेसब्री से कुलबुलाते वे अनगिनत सवाल भी मौजूद थे जो अपने पूछे जाने का इंतिज़ार कर रहे थे।
ख़ालिद साहब ने मेरी तमाम जिज्ञासाओं और सवालों के तसल्लीबख़्श जवाब दिए, लेकिन इतने मुख़्तसर वक़्त में आख़िर कितना ही पूछा जा सकता था! लौटते हुए एक अजीब-सी प्यास बाक़ी रह गई—जैसे कोई दरिया के बिल्कुल क़रीब जाकर भी प्यासा लौट आया हो। वापस आने के बाद मैंने उनसे फ़ोन पर कुछ और सवाल पूछने की इजाज़त चाही। मेरा मानना था कि उनके जवाब मुझे उनके लिखने के तरीक़े, उनके ज़ाविये और उनकी तख़्लीक़ी दुनिया को कुछ और गहराई से समझने में मदद करेंगे। उन्होंने इस बार भी निराश नहीं किया। मैंने अपने तमाम सवाल उन्हें भेज दिए और उन्होंने बेहद तफ़सील और संजीदगी के साथ एक-एक सवाल का जवाब दिया। उन जवाबों ने न सिर्फ़ मेरी उत्सुकताओं को शांत किया, बल्कि बतौर शाइर भी मुझे बहुत कुछ नया सोचने और समझने की राह दिखाई।
मुझे उम्मीद है कि यह बातचीत सिर्फ़ मेरे ही नहीं, बल्कि उन तमाम पाठकों के इल्म में भी इज़ाफ़ा करेगी जो ख़ालिद जावेद की तख़्लीक़ी दुनिया में दिलचस्पी रखते हैं।
ख़ालिद जावेद साहब का बेहद शुक्रिया कि उन्होंने अपना बेशक़ीमती वक़्त दिया। उनके नए उपन्यास ‘इक्कीस एक सौ बाईस’ के लिए ढेरों शुभकामनाओं के साथ पेश है यह बातचीत :
पूजा भाटिया : ख़ालिद साहब, मैं आपकी चार किताबें अब तक पढ़ चुकी हूँ। कमोबेश उन सभी में मुझे इंसानी ज़ेहन का वह तारीक गोशा साफ़ दिखाई दिया है; जहाँ दबी-छुपी ख़्वाहिशें, कुढ़न, ख़ौफ़, असुरक्षाएँ और न जाने कितनी स्याह अलामतें पनाह लिए रहती हैं। ज़ाती तौर पर, शुरुआत में इन्हें पढ़ना और इन एहसासों को स्वीकार करना मेरे लिए एक धूसर और बेचैन करने वाला तजुर्बा था; लेकिन धीरे-धीरे वही चीज़ एक अजीब-सी रिहाई और राहत में तब्दील होती चली गई।
मैं जानना चाहती हूँ कि इस तरह का लेखन आपके भीतर किस प्रक्रिया से गुज़रकर आता है। लिखते वक़्त आपका मानसिक परिदृश्य कैसा होता है? क्या आप भी किसी भीतरी उथल-पुथल, बेचैनी या विचलन से गुज़र रहे होते हैं; या फिर यह सब एक सजग और नियंत्रित रचनात्मक अवस्था में आकार लेता है?
ख़ालिद जावेद : देखिए, मैं यह कहूँगा कि लिखना एक तरह से अकेले हो जाने का दूसरा नाम है। आप जब लिखते हैं तो अकेले आप हो ही जाते हैं। इस अकेलेपन को भी आप एक यातना का नाम दे सकते हैं, लेकिन जहाँ तक मेरे नॉवलों की या मेरी कहानियों की थीम का सवाल है तो देखिए हर आदमी के पास बुनियादी तौर पर एक ही कहानी होती है। जैसा कि रिल्के ने कहा था, “सबके पास एक ही कहानी होती है सुनाने के लिए...” यानी कोई एक ही बिंदु होता है, जिसके चारों तरफ़ आप बार-बार घूमते हैं। मुझे यह नहीं लगता कि मेरा कुछ पर्सनल उसमें होता है; क्योंकि मेरी जो पर्सनल लाइफ़ है, वह बिल्कुल अलग है। या जो मेरा फ़ैमिली बैकग्राउंड है, उसमें इस तरह का कोई मसअला नहीं है। लेकिन अब क्या रिसीवर मेरे पास है? किस तरह के कंपन मैं पकड़ता हूँ? क्योंकि यह जो संसार है, इसमें तरह-तरह की तरंगें फैली हुई हैं। अब इसमें सुख की, दुख की, ख़ुशी की, ग़म की, घृणा की, प्यार की, प्रेम की, रहम की और करुणा की सबकी तरंगें फैली हुई हैं। अब आप दुनिया को देखें या उसको महसूस करें। दुनिया को महसूस करना मुझे लगता है कि ज़्यादा ज़रूरी है, बजाय इसके कि आप दुनिया को समझें।
मुझे लगता है कि मैं दुनिया को समझने की कोशिश नहीं करता हूँ, क्यूँकि मेरे नज़दीक दुनिया कोई मैथमेटिक्स का सवाल नहीं है जिसको कि एक बार आप समझ जाएँ, मैं समझता हूँ कि इस दुनिया को जैसी ये है उसको उसकी इंटीग्रिटी के अंदर महसूस किया जाना चाहिए।
आमतौर से जो कुछ लिखा जाता है और जैसा लिखा जा रहा है उसमें एक यह तसव्वुर हमारे यहाँ होता है कि भई कोई होप हो,कोई उम्मीद का कोई पहलू खुले या आप कोई यूटोपिया दे दें या आप एक ऐसी अफ़ीम दे दें कि जिससे आपको लगे कि सब कुछ बेहतर है, लेकिन वो मुझे नहीं लगता। मुझे लगता है कि दुनिया बड़ी तेज़ी के साथ बिगड़ रही है और जो वैल्यूज़ हैं वो भी गिर रही हैं और ख़ास तौर से जो ह्यूमन वैल्यूज़ हैं, उनका बहुत बुरी तरह से जवाल-सा आ रहा है। अब सवाल ये है कि शाइरी तो इन चीज़ों को उतनी जगह देगी नहीं, क्योंकि शाइरी के अंदर मसअला यह होता है कि वो एक ऊँचे मिंबर से खड़े होकर बात करती है।
वो चाहे कितनी भी दाख़िली शाइरी हो, लेकिन वो एक टाइप का स्टेटमेंट हो जाती है, एक कैफ़ियत का इज़हार होता है। वो कैफ़ियत वक़्ती होती है। ख़ास तौर पर जैसे कि उर्दू शाइरी में या ये कहना चाहिए कि उर्दू ग़ज़ल में। मेरा मानना है कि बदसूरती तमाम दुनिया में फैली हुई है और बदसूरती की घुट्टी पीकर ही ख़ूबसूरती का जन्म होता है।
एक थीसिस बनाकर जब आप फ़िक्शन लिखेंगे, क्योंकि फ़िक्शन एक ज़्यादा बड़ा सच है। यानी जो कुछ नहीं हुआ है, लेकिन जो हो सकता था, जिसके होने की संभावना थी, तो फ़िक्शन उसको भी अपनी बाँहों में जगह देता है। यही वजह है कि जितना आपके फ़िक्शन में आपका अनुभव काम आता है, उससे कहीं ज़्यादा इमेजिनेशन काम आता है। अब सवाल यह कि मैं बार-बार क्यों इसी थीम की तरफ़ जाता हूँ, यानी दुख की थीम पर या स्याह की तरफ़ जाता हूँ तो मैंने एक जगह लिखा है कि भई मैं जानता नहीं कि मेरा कौन-सा ऐसा टेम्परामेंट है या हर आदमी के अंदर कुछ न कुछ एक ओसीडी है... मेरे हिसाब से शायद इसी तरह मुझे ये चीज़ें अपील करती हैं। मुझे एब्नॉर्मल किरदार अपील करते हैं।
पूजा भाटिया : एक बार आपने कहानी और उपन्यास के फ़र्क़ को बेहद ख़ूबसूरत मिसाल के साथ बताया था, एक बार और बताइए ताकि मैं बिना हेरफेर उसे लिख पाऊँ...
ख़ालिद जावेद : नॉवेल और अफ़साने की बात करें उसके हवाले से लोग यह मानते हैं कि नॉवेल जो है उसमें तवालत होती है और अफ़साना जो है वह मुख़्तसर होता है। लोग कहते हैं कि अफ़साने में एक वाक़या होना चाहिए, नॉवेल में बहुत से वाक़ियात हो सकते हैं। लेकिन दरअस्ल कहानी दोनों में होगी, दोनों में प्लाट होंगे, दोनों में किरदार होंगे। उसकी एक मिसाल जगह-जगह मैं देता आया हूँ, इसे यूँ समझें कि मैं अपने कमरे में आता हूँ और मैं अपने कमरे का ताला खोलता हूँ, मैं देखता हूँ कि लाइट नहीं है, पावर कट हो रखा है। तो मैं ठिठकते हुए कदमों से अंदर आता हूँ, मेरे जेब में एक दिया सिलाई की डिब्बी पड़ी है, मैं माचिस जलाता हूँ और जितनी जगह रोशनी होती है, कोई एक कोना मुझे मान लीजिए नज़र आता है, उस कोने में रोशनी होती है जहाँ मैं देखता हूँ कि मेरी दो किताबें रखी हुई हैं या एक स्टूल पड़ा हुआ है। या वहाँ पे मकड़ी के जाले हैं या वहाँ कोई बिल्ली का बच्चा बैठा हुआ है, है ना? ये तो मिसाल है। तो वो उतनी चीज़ को परसीव करना, उतनी चीज़ को देखना, वो कहानी है।
अब दूसरी सूरत-ए-हाल यह है कि वही कमरा है और मैं अपने कमरे में आता हूँ। मैं आराम के साथ बिजली के सारे स्विच ऑन करता हूँ, पूरा कमरा मेरे सामने रोशन है। मैं देख रहा हूँ कि सामने डाइनिंग टेबल पर पानी का गिलास रखा हुआ है, जग रखा हुआ है। मैं हर कोने को देख रहा हूँ, कहाँ सोफ़ा है, कहाँ फ़र्नीचर है, कहाँ बेड है। हर चीज़ देख रहा हूँ। कहाँ पर गुलदान रखा हुआ है। तो एक-एक चीज़ मैं वहाँ पर देख रहा हूँ। तो ये नॉवेल है।
पूजा भाटिया : जो लोग स्टोरी-राइटिंग या क्रिएटिव राइटिंग की तरफ़ जाना चाहते हैं, उनके लिए आपका क्या सुझाव है?
ख़ालिद जावेद : मैं नहीं समझता कि मैं आज किसी ऐसी पोजीशन पर हूँ या मेरा कोई ऐसा स्तर है कि जिस पर मैं किसी को सजेशन दे सकता हूँ, फिर भी अगर आप मेरी उम्र को कंसीडर करें और उसको देख कि मैं ये समझूँ कि जो नौजवान हैं जो मुझसे बहुत कम उम्र के हैं तो उनके लिए मैं यह कहना चाहूँगा कि आसपास की दुनिया को बहुत ग़ौर से देखें। अगर बाज़ार में जा रहे हैं तो अगर सड़क पर जा रहे हैं तो घर में बैठे हैं तो खाना खा रहे हैं तो... अगर आपको क्रिएटिव राइटर बनना है तो वो अपने अंदर वो एक एहसास है उस एहसास को उभारने की कोशिश करें। हालाँकि देखिए, मैं यह भी मानता हूँ कि राइटर्स आर बॉर्न, नॉट मेड; पोएट्स आर बॉर्न, नॉट मेड... वेयर ऐज़ मैनेजर्स आर मेड नॉट बॉर्न, डॉक्टर्स आर मेड नॉट बॉर्न, लेकिन फिर भी इसकी पेरिफेरी में हम आस-पास घूम सकते हैं।
हम जो भी देखें और उसको अपने ढंग से सोचने की कोशिश करें, मतलब कंडीशन जो हो जाती है हमारी शुरू से, हम जिस घर में पैदा होते हैं तो एक ख़ास रिलीजन, एक ख़ास क़िस्म का एक माहौल हमारे पास होता है, एक कल्चर होता है हमारे घर का उसमें जो सुनी-सुनाई बातें होती हैं। तो एक तो ये कि बहुत लॉजिकल होना चाहिए आपको... और लॉजिक का ये मतलब नहीं है कि आपके अंदर इमेजिनेशन नहीं होगा, बल्कि उस लॉजिक के पार जाकर मतलब इललॉजिकल नहीं होना है, लेकिन उस लॉजिक्स को पार करके उससे मावरा होके उस लॉजिक को पीछे छोड़ते हुए आपको एक अपना दूसरा लॉजिक तलाश करना होगा, क्योंकि कहानी की जो शर्तें होती हैं; वो ज़िंदगी की शर्तें नहीं होतीं और यह बात तो ‘भारतनाट्यम में भी कही गई है कि आर्ट की यानी कला की जो शर्तें होती हैं, वो दुनिया की शर्तों से मुख़्तलिफ़ होती है और कभी-कभी तो उसके बिल्कुल उलट भी होती हैं। क्योंकि अब किसी को किसी बात पर हैरत ही नहीं होती। एक तो अपने अंदर का वंडर बहुत ज़्यादा ज़िंदा रखने की बात है। जो भी क्रिएटिव राइटर है, उसे बच्चों की तरह होना चाहिए। मतलब चीज़ों को देखकर, दुनिया को देखकर, लोगों को देखकर हैरत का जज़्बा उसके अंदर पैदा होना चाहिए। आज आश्चर्य ख़त्म हो रहा है, क्योंकि हम इतने हाई-टेक हो गए हैं। एआई ने तो और भी क्रिएटिविटी को ख़त्म कर दिया है। मैं मानता हूँ एक लेखक को एआई से बिल्कुल मदद नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि देखिए एआई कुछ भी कर ले, लेकिन क्रिएटिव राइटिंग में जो ह्यूमन-एंगल होता है; वह उस तक कभी पहुँच ही नहीं सकता है; क्योंकि उसके पास तो सैकड़ों प्रोग्राम हैं फ़ीड किए हुए, तो वो तो तुक्का मारेगा फिर ह्यूमन-एंगल को लाता तो है वो, लेकिन वो एक टाइप का परमिटुशन और कॉम्बिनेशन होता है। यह बड़ा नुक़सानदेह है। लेकिन अगर आप रचनाकार हैं या रचनाकार बनना चाहते हैं, जो मुझे लगता है कोई बनना-वनना चाहता नहीं है, सबको बस एक शौक़ होता है और एक तफ़रीह होती है। तो एक तो यह कि तफ़रीह के लिए कुछ न पढ़ें। मतलब इनसाइट के लिए अगर लिखें तो उसमें जब तक कोई इनसाइट न हो, जो भी पढ़ें उसमें कोई इनसाइट न हो, तो उसके लिए वो भरोसा न करें, अपने आप पर भरोसा करे। अपने परसेप्शन पर भरोसा करे, अपने सेंसेशन पर भरोसा करे और दुनिया को ऐसे देखें जैसे कि पहली बार देख रहे हैं; ताकि दुनिया के छुपे हुए पहलू उनके ऊपर आशकार हो सके।
पूजा भाटिया : कहीं सुना था कि लिखने का शौक़ रखने वाले को सब कुछ पढ़ना चाहिए, ताकि उसे पता चले की क्या कहना है और क्या नहीं? वहीं कुछ का कहना है कि सब कुछ पढ़ने से दिमाग़ी क़ब्ज़ियत का शिकार होना मुमकिन है सो सोच-समझकर ही कोई सफ़हा खोलना चाहिए... आपका इस पर क्या कहना है?
ख़ालिद जावेद : अपनी-अपनी हद तक दोनों ही बातें ठीक होती हैं। लिखने वाले को पढ़ना तो चाहिए, क्योंकि फिर उसकी ट्रेनिंग कैसे होगी। लेकिन बहुत कुछ रिजेक्ट करना होता है। हम दुनिया में जब किसी से प्रेम करते हैं तो उसको चूज करते हैं और बाक़ी लोगों को हम रिजेक्ट करते हैं, एक तरह से। कुछ भी हासिल करने के लिए, बहुत सारी चीज़ों को छोड़ना पड़ता है या उनको हमें निगेट करना पड़ता है। मैं तो यही कहूँगा कि रद्द करना पड़ता है।
पूजा भाटिया : आपके पसंदीदा शाइर और शाइरी की किताबें कौन-सी हैं?
ख़ालिद जावेद : पसंदीदा शाइर ज़ाहिर है कि पहले तो मीर और ग़ालिब हैं, अगर हम क्लासिकल की बात करें। मुझे नज़्में बहुत पसंद हैं, नज़्म के शाइर बहुत पसंद हैं तो मुझे फ़ैज़, मीराजी, अख़्तरुलईमान और मजीद अमजद बहुत ज़्यादा पसंद रहे हैं। ये मेरे शाइर हैं।
जदीद दौर जब आया तो उसमें नासिर काज़मी के बाद फिर अहमद मुश्ताक़, ज़फ़र इक़बाल और इरफ़ान सिद्दीक़ी मेरे पसंदीदा शाइर हैं। अगर आप हमअस्र शुअरा की बात करेंगी तो उसमें फिर ज़ाहिर है कि फ़रहत एहसास मेरे सबसे पसंदीदा शाइर हैं। मेरा यह मानना है कि पूरे बर्रे-सग़ीर में इस वक़्त उनसे अच्छी ग़ज़ल की शाइरी कोई नहीं कर रहा है। वो मेरे बहुत अज़ीज़ भी हैं और मेरे ऐसे दोस्त हैं जिन पर मुझे फ़ख़्र है।
फिर दूसरा नाम शारिक कैफ़ी का है। शारिक कैफ़ी तो मेरे बचपन के दोस्त हैं। हम लोगों ने साथ में हाई स्कूल, इंटर, बी.एससी. सब कुछ साथ किया है। वो मेरे लिखने के गवाह हैं, मैं उनके लिखने का गवाह हूँ। जब मैंने पहली कहानी (ख़ैर, मैंने तो पहली कहानी आठ साल की उम्र में लिखी थी) या कहें मेरी शुरुआती कहानियाँ जो भी हैं, बरेली के ज़माने में मैंने सबसे पहले उन्हें ही सुनाईं। हम लोग बैठते थे, बातें करते थे। हम लोग रूसी साहित्य बहुत साथ-साथ पढ़ते थे। वो भी रूसी अदब के बहुत ज़्यादा दिलदादा हैं। और उनकी शाइरी का गवाह मैं हूँ। वो अपने तर्ज़, अपने लब-ओ-लहजे के बिल्कुल अनोखे शाइर हैं। उनकी तरह की शाइरी भी कहीं नहीं हो रही है। ये दो लोग आज के ज़माने में मेरे बड़े पसंदीदा शाइर हैं।
मैं हिंदी का भी ज़िक्र करना चाहूँगा। हिंदी में मुझे उदयन वाजपेयी की नज़्में बड़ी ग़ैरमामूली लगती हैं। वह मुझे बहुत ज़्यादा पसंद हैं। हमेशा से उनकी नज़्मों ने मुझे बहुत अपील किया है।
अँग्रेज़ी में, जिनका मैंने तर्जुमा पढ़ा है, उनमें पाब्लो नेरूदा बहुत बड़ा नाम है। फिर नाज़िम हिकमत, महमूद दरवेश, येहूदा आमिखाई और फ़र्नांदो पेसोआ हैं। इनको मैं बड़े शौक़ से पढ़ता रहता हूँ। ज़ाहिर है कि अँग्रेज़ी की पुरानी शाइरी अपनी जगह एक माइलस्टोन है ही।
और मैं फ़िक्शन कम पढ़ता हूँ, यह मैं आपको बताऊँ। ख़ास तौर पर उर्दू और हिंदी फ़िक्शन कम पढ़ता हूँ, क्योंकि एक तो बहुत पहले का सब कुछ पढ़ा हुआ है। और जो कंटेम्पररी फ़िक्शन लिखा जा रहा है—न सिर्फ़ उर्दू में, न सिर्फ़ इंडिया में बल्कि पाकिस्तान में भी—वहाँ शाइरी ज़्यादा अच्छी हो रही है। आप देखिए, हिंदुस्तान में भी शाइरी ज़्यादा अच्छी हो रही है।
शाइर तो बहुत अच्छे हैं, लेकिन फ़िक्शन-निगार उस स्तर के नहीं हैं। अगर आप उर्दू में देखें तो यह बात बहुत शुरू से होती आ रही है। आप देखिए कि उर्दू की शाइरी की रिवायत में जिस तरह ग़ालिब और मीर हैं, या बाद में मीराजी और फ़ैज़ हैं, उस स्तर के अगर आप अफ़साना-निगार या नॉवेल-निगार छाँटना चाहेंगे, तो आपको नहीं मिलेंगे। उस ज़माने से भी नहीं मिलेंगे। यह इसलिए भी है कि हमारी पूरी तनक़ीद और आवामी रवैया शाइरी की तरफ़ ज़्यादा मुतवज्जेह रहा है। शाइरी की तनक़ीद बहुत लिखी गई, शाइरी की किताबों पर रिव्यू बहुत आए। उसकी एक पब्लिक अपील भी थी, जो फ़िक्शन की नहीं थी। शायद इस वजह से फ़िक्शन के क़ारी की भी सही तरह तरबियत नहीं हुई, जबकि शाइरी के क़ारी की हुई है।
शाइरी के हवाले से एक बात और। मैं यह भूल गया, क्योंकि अब फ़रहत एहसास और शारिक कैफ़ी—इन दोनों का भी हमारे बहुत सीनियर शुअरा में शुमार होने लगा है। बिल्कुल दौर-ए-हाज़िर की बात करूँ तो अमीर इमाम की शाइरी मुझे बहुत पसंद है, सालिम सलीम की शाइरी भी मुझे पसंद है। तसनीफ़ हैदर की शाइरी और कहानियाँ, दोनों मुझे पसंद हैं।
नए लिखने वालों में दो-तीन नाम अगर मैं न लूँ तो बड़ी नाइंसाफ़ी होगी। रिज़वानुल हक़ हैं। अभी उनका एक नॉवेल ‘ख़ुदकुशीनामा’ आया है, जो बहुत उम्दा नॉवेल है।
फिर हमारे दोस्त हैं ख़ुर्शीद अकरम। उनकी नज़्में और कहानियाँ दोनों बड़े कमाल की हैं।
पाकिस्तान की भी बात करें। मेरे दोस्त हैं इनाम नदीम और मुस्तफ़ा अरबाब। क्या कमाल की शाइरी है इनकी! मैं बता नहीं सकता। ये वो लोग हैं जिनसे आप यह समझिए कि अदब की महफ़िल में चराग़ जल रहे हैं।
मुझे मजमूई सूरत-ए-हाल में लगता है कि हमारा क़ारी, यानी रीडर, बहुत ज़्यादा सहलपसंद हो गया है। वह यह चाहता है कि जो भी चीज़ उसके सामने रखी जाए, वह खुली प्लेट में रखकर दी जाए, बल्कि निवाला उसके मुँह में ही रख दिया जाए। इसे यूँ समझिए कि जैसे एक बच्चा होता है, वह चॉकलेट को रैपर के साथ ही पसंद करता है। यानी जो ऊपर की चीज़ें होती हैं, उनके बाद वह चॉकलेट खाता है और बताएगा कि मीठी थी या कड़वी। लेकिन हमारे क़ारी को तो आप चॉकलेट का रैपर वग़ैरा हटाकर, उसके टुकड़े करके, उसका चूरा बनाकर मुँह में डालिए, जिससे कि वह मुँह में घुल जाए। आजकल के क़ारी को कहते सुनता हूँ कि “हाँ भाई, फलाँ नॉवेल था, हमारे सर के ऊपर से गुज़र गया।”
तो भाई, अपने सिर को वहाँ तक ले जाइए। यह लिखने वाले की ज़िम्मेदारी थोड़ी है कि वह आपके सिर का ख़याल रखेगा। वह तो अपने ख़ून की ताल पर लिखेगा, अपने दिल से लिखेगा, अपने मिज़ाज के एतबार से लिखेगा। अगर आप उसको पढ़ रहे हैं तो उस तक पहुँचने की कोशिश कीजिए। सारी दुनिया में यही होता है।
अगर एक ही तरह का अदब लिखा जाता रहता, तो दुनिया का कोई आर्ट, कोई भी कला कभी ग्रो नहीं कर सकती थी। जो इतनी थ्योरियाँ आईं, जो इतने तरह-तरह के उस्लूब पैदा हुए, शाइरी में भी, फ़िक्शन में भी, इतने स्टाइल पैदा हुए, इतने नए नैरेटिव आए... तो यह सब होता ही नहीं।
जब तक आप एक्सपेरिमेंटल राइटिंग नहीं करेंगे, जब तक आप रिवायत के ख़ौफ़ में डूबे रहेंगे कि “अरे, यह किसी के समझ में नहीं आया तो क्या होगा?”, “अरे, इससे कोई नाराज़ न हो जाए...”, “अरे, इतनी अँधेरी बात क्यों करनी है?”, “इतना डार्क कैसे लिख रहे हैं?”, “इसमें तो डिसगस्टिंग बहुत है...”, “इसमें तो फ़लाँ चीज़ें बहुत हैं...”—इस सबका मतलब है कि आप जोखिम नहीं लेना चाहते। और जब तक आप जोखिम नहीं लेंगे, मुझे लगता है कि अदब में सबसे ज़्यादा जोखिम लिया जाता है। यह तो पूरा उसूल है कि No Risk, No Gain. अगर आप एक क़तार में ही चले जा रहे हैं, तो आपको क़तार तोड़नी पड़ेगी।
देखिए, मैं अपनी बात को ऐसे ख़त्म करूँगा कि ग़ालिब का एक बहुत उम्दा शे’र है, जो मुझे बहुत पसंद है। ऐसा वुजूदी शे’र है, जिसके अंदर वुजूदी फ़लसफ़े की जितनी डाइमेंशंस हैं, वे सारी की सारी निकलकर आ गई हैं :
मैं और एक आफ़त का टुकड़ा, वो दिल-ए-वहशी कि है
आफ़ियत का दुश्मन और आवारगी का आशना
तो जब तक आप आफ़ियत के दुश्मन नहीं बनेंगे, तब तक इस बदलते हुए ज़माने, बदलते हुए अहद और बदलते हुए इंसान के साथ नहीं चल पाएँगे। आपको इसके साथ ख़ुद भी ग्रो करना चाहिए—लिखने वाले को भी और शाइर को भी, और पढ़ने वाले को तो और भी ज़्यादा ग्रो करना चाहिए। वरना सूरत-ए-हाल जो है, उसे मैं तो मायूसकुन ही समझता हूँ। अब उपभोक्तावाद आ गया है, तो अदब, शाइरी और आर्ट जैसी, जो कि ह्यूमन-कॉन्शसनेस की चीज़ें हैं, उनकी तरफ़ वैसे ही तवज्जोह बहुत कम है। जब इतना ख़राब लिखा जाएगा, जब सोप ओपेरा की तरह लिखा जाएगा, जब सिर्फ़ तफ़रीह के लिए लिखा जाएगा, तो उसकी वैल्यू क्या होगी? और रीडर को पैदा करने की ज़िम्मेदारी, देखिए, राइटर की भी होती है। शुरू-शुरू में मुझ पर बड़े इल्ज़ाम थे कि भई, आपकी चीज़ कोई नहीं समझ रहा है। लेकिन अब धीरे-धीरे आप देखेंगे कि मेरे पढ़ने वालों का एक बहुत बड़ा हलक़ा पैदा हो गया है और अगर आप इसे मेरी बड़बोली बात न समझें, तो यह देखिए कि मैं कभी अपने रास्ते से नहीं हटा और मैंने कभी उनकी बात नहीं मानी, जो मुझसे कहते थे कि आसान लिखो, उनके लिहाज़ से आसान लिखो। हालाँकि अदब में आसान और मुश्किल क्या होता है, मुझे नहीं मालूम; यह मैथमेटिक्स थोड़ी है। वे कहते थे कि ऐसा लिखो जो दूसरों तक पहुँचे। मैंने कहा, पहुँचेगा—जिन तक पहुँचना है, उन तक पहुँचेगा।
तो पिछले पच्चीस सालों से मैंने अपना रास्ता नहीं बदला। अब धीरे-धीरे मैं यह देखता हूँ कि मेरा रीडर पैदा हो गया है, और न सिर्फ़ हिंदुस्तान में, बल्कि पाकिस्तान में और बाहर भी। इस तरह अगर लिखने वाला ही जोखिम नहीं उठाएगा, तो रीडर भी कहाँ से पैदा होगा? इसलिए रीडर का ख़ौफ़ हमारे ऊपर नहीं होना चाहिए।
लेखक को बहुत बेबाकी के साथ लिखना चाहिए, बहुत-बहुत बेबाकी के साथ। और अगर आपके पास लिखने के लिए कोई नई चीज़ नहीं है, तो बेहतर यह है कि आपको लिखना ही नहीं चाहिए। आपको क्या ज़रूरत है कि शाइरी करें? क्या ज़रूरत है कि आप अदब तख़्लीक़ करें?
दुनिया में बहुत-से काम हैं, उन्हें आप कर सकते हैं। अगर ऐसी ज़िंदगी गुज़र रही है, तो फिर वैसे ही गुज़ारिए। फिर यह घाटे का सौदा क्यों करें? ये ख़सारों की फ़स्ल क्यों बोएँ आप?
पूजा भाटिया : राइटर्स ब्लॉक के बारे में अक्सर सुनती हूँ। आपके नज़दीक यह क्या है, और क्या आप भी इससे गुज़रते हैं?
ख़ालिद जावेद : मुझे राइटर्स ब्लॉक का तजुर्बा कभी नहीं हुआ। इसकी वजह यह है कि मैं नॉवेल और अफ़साना न भी लिखूँ, तो मैं रोज़ाना डायरी लिखता हूँ—पाबंदी के साथ। यह मैं पिछले बत्तीस साल से कर रहा हूँ। मुझे रोज़ दो-चार पन्ने लिखने ही होते हैं। मेरी डायरी में रोज़मर्रा की दिनचर्या का कोई ब्योरा नहीं होता, बल्कि जो मेरा वुजूद है वह उस दिन जिन चीज़ों से टकराता है, जिस माहौल से टकराता है, उसका जो इंप्रेशन मुझ पर पड़ता है, मैं उन इंप्रेशनों को लिखता हूँ। मैं चीज़ों के बारे में नहीं लिखता, बल्कि चीज़ों के ज़रिये मुझ पर जो असर होता है, उस असर को लिखता हूँ।
और मैं आपको बताऊँ कि मैं कंप्यूटर पर नहीं लिखता, मैं टाइप भी नहीं करता, मैं हाथ से लिखता हूँ। इसलिए लिखना मेरे लिए कभी ऐसा काम नहीं रहा कि जिसके बारे में मैं अलग से सोचूँ। ऐसा नहीं है कि मैंने कोई कहानी या नॉवेल लिखा और उसके बाद दो-तीन साल की कोई लंबी ख़ामोशी आ गई।
जब मैं कोई नॉवेल या अफ़साना नहीं भी लिख रहा होता हूँ; तब भी उसका प्लॉट, उसकी थीम, या उसके बारे में जो मैं आगे लिखूँगा, वह बराबर मेरे ज़ेहन में चलता रहता है। चाहे मैं कार ड्राइव कर रहा हूँ, चाहे पैदल चल रहा हूँ, चाहे कहीं बैठा हूँ, चाहे दोस्तों के बीच हूँ, चाहे किसी महफ़िल में मौजूद हूँ... वह सब लगातार ज़ेहन में चलता रहता है।
इसलिए मुझे राइटर्स ब्लॉक जैसी किसी कैफ़ियत का सामना नहीं करना पड़ता, कम-से-कम आज तक तो नहीं पड़ा। क्योंकि मैं रोज़ लिखता हूँ, और मेरी डायरी मेरे लिए बहुत मददगार साबित होती है। जब मैं नॉवेल और अफ़साने लिखता हूँ, तो उनमें बहुत-सा डिस्कोर्स मेरी डायरी से चला आता है।
शायद इसी वजह से मुझे राइटर्स ब्लॉक या जिसे कुछ लोग ‘लर्निंग प्लेटो’ भी कहते हैं, यानी रास्ते में एक पठार-सी स्थिति आ जाना—का अनुभव नहीं हुआ, क्योंकि मेरे लिए लिखना साँस लेने के बराबर है, और पढ़ना भी। अगर मैं लिखूँगा नहीं, पढ़ूँगा नहीं, तो जिऊँगा कैसे?
पूजा भाटिया : आपने भारतीय दर्शनशास्त्र पढ़ा भी है और पढ़ाया भी है। आप इसकी किस थ्योरी को अपने ज़्यादा क़रीब पाते हैं? दर्शनशास्त्र की कोई ऐसी किताब, या किताबें, जो आपको ख़ासतौर पर पसंद हों?
ख़ालिद जावेद : इसके बारे में मैं यह कहूँगा कि यूँ तो भारतीय दर्शन के जो छह स्कूल हैं, उनमें मुझे सांख्य बहुत पसंद है। ख़ासतौर से सांख्य दर्शन में प्रकृति और पुरुष का जो संबंध है, और जिस तरह उसके ज़रिये वह पूरे यूनिवर्स को समझा देता है, मुझे लगता है कि वह बहुत ही साइकोलॉजिकल भी है।
सांख्य दर्शन जितना मनोवैज्ञानिक है, भारतीय दर्शन में बुद्ध-दर्शन को छोड़कर इतना मनोविज्ञान आपको कहीं और नहीं मिलेगा। और फिर बुद्ध का जो दर्शन है, उससे तो मैं बहुत मुतास्सिर हूँ। बुद्ध का दर्शन मुझे बार-बार हेराक्लाइटस की बात याद दिलाता है, जो बहुत मशहूर यूनानी फ़िलॉसफ़र था। उसने कहा था कि “You cannot take bath twice in the same river”—तुम एक ही नदी में दो बार नहीं नहा सकते, क्योंकि इस बीच नदी का पानी बदल जाता है।
बुद्धिज़्म का जो क्षणिकवाद है, वह बहुत ही कमाल की चीज़ है। जो कुछ है, वह सिर्फ़ एक मोमेंट है। मुझे लगता है कि ख़ासतौर पर अदब के लिए बुद्धिज़्म को पढ़ना ज़रूरी है। अस्तित्ववाद तो बुद्ध के यहाँ भरा पड़ा है। अगर आप बुद्धिज़्म को बहुत ग़ौर से पढ़ते हैं, तो पाएँगे कि इन सब चीज़ों की मीमांसा वहाँ इतनी बारीकी और इतनी गहराई से की गई है कि शायद किसी और दर्शन ने इस पर इतना ग़ौर नहीं किया।
इसके अलावा, ऑन द होल, मुझे वेदांत भी बहुत प्रभावित करता है। शंकराचार्य की माया की पूरी थ्योरी—यह जो इल्यूज़न का सिद्धांत है कि रस्सी को साँप समझ लिया जाता है—वह मुझे बहुत मुतास्सिर करता है। उसमें जो वेदांतीयता है, मुझे लगता है कि वह हमारे पूरे तसव्वुफ़, यानी मुस्लिम मिस्टिसिज़्म, के भी बहुत क़रीब है; क्योंकि जब वे ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ की बात करते हैं, तो वह लगभग वही ‘अनलहक़’ वाली बात हो जाती है।
मैं भारतीय दर्शन से बहुत ज़्यादा इम्प्रेस हूँ, इसलिए कि भारतीय दर्शन दरअस्ल जीवन का साक्षात्कार है। जबकि पाश्चात्य दर्शन के बारे में कहा जाता है कि वह love for wisdom है। फ़िलॉसफ़ी के जो मानी हैं, वे यही हैं—ज्ञान या प्रज्ञा के प्रति प्रेम। वहाँ ज्ञान को जानना ज़्यादा अहम है।
वेस्टर्न फ़िलॉसफ़ी ज्ञान को सिद्धांतों के ज़रिये समझती है, लेकिन इंडियन फ़िलॉसफ़ी में, चूँकि इसका नाम ही ‘दर्शन’ है, इसलिए वहाँ सिर्फ़ जानना काफ़ी नहीं है। जो कुछ जाना गया है, उसके साथ साक्षात्कार भी है। उसके साथ आपको अपने आप को आइडेंटिफ़ाई करना है, उसके साथ एकाकार हो जाना है।
अगर भारतीय दर्शन की किसी किताब के बारे में मुझसे पूछा जाए, तो मैं कहूँगा कि एस. एन. दासगुप्ता की ‘भारतीय दर्शन’ बहुत ज़रूरी किताब है। उसके कई भाषाओं में तर्जुमे हुए हैं। जिस तफ़सील और गहराई से उन्होंने भारतीय दर्शन को समझाया है, वैसा काम बहुत कम लोगों ने किया है। इसके अलावा डॉ. बी. लाल की किताबें भी महत्त्वपूर्ण हैं।
वेस्टर्न फ़िलॉसफ़ी में मुझे बर्ट्रेंड रसेल की मशहूर किताब A Critical History of Western Philosophy बहुत पसंद है। मैं चाहूँगा कि लोग उसे पढ़ें। लेकिन जो बिगिनर्स हैं, जो इस फ़ील्ड में बिल्कुल नए हैं और बुनियादी बातें जानना चाहते हैं, उनके लिए मैं विल ड्यूरांट की The Story of Philosophy की सिफ़ारिश करूँगा।
इसके अलावा योस्ताइन गॉर्डर की Sophie’s World भी ज़रूर पढ़नी चाहिए। इसका हिंदी तर्जुमा ‘सोफ़ी की दुनिया’ के नाम से उपलब्ध है। यह बड़ी मज़ेदार किताब है। इसमें सोफ़ी नाम की एक लड़की है, जिसके घर के पास लगे लेटर-बॉक्स में रोज़ एक ख़त आता है। जब वह ख़त खोलती है, तो उसमें किसी फ़िलॉसफ़र या किसी दार्शनिक सिद्धांत के बारे में बहुत आसान ज़बान में बातें की गई होती हैं।
उन सिद्धांतों को बड़े दिलचस्प और बेतकल्लुफ़ अंदाज़ में समझाया गया है, जैसे कोई दोस्त ख़त लिखकर बातें कर रहा हो। रोज़ एक नया ख़त आता है और इसी तरह पूरी वेस्टर्न फ़िलॉसफ़ी की हिस्ट्री बयान कर दी जाती है।
मुझे लगता है कि ‘सोफ़ी की दुनिया’ ज़रूर पढ़नी चाहिए और विल ड्यूरांट की The Story of Philosophy भी। आगे की रहनुमाई फिर वे किताबें ख़ुद कर देंगी। उसके बाद आदमी अपने दिल और दिमाग़ की रोशनी में आगे बढ़ता चला जाता है।
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